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सुलतानपुर:-नंद घर आनंद भयो..जय कन्हैया लाल की खुनका में बह रही भागवत कथा की रसधार

Shyam Chandra Srivastav 2020-02-04 12:44:39    MEDITATION 3501
सुलतानपुर:-नंद घर आनंद भयो..जय कन्हैया लाल की खुनका में बह रही भागवत कथा की रसधार
सुल्तानपुर, 4 फरवरी 2020, (आरएनआई )। विकासखंड धनपतगंज के खुनका बहादुरपुर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन भगवान श्रीकृष्ण जी का प्राकट्य उत्सव हुआ।भव्य झांकी और मंगलगीत के साथ सुंदर भजनों से पूरा माहौल भक्ति मय हो गया। संगीतमयी कथा रूपी गंगा में भगतप्रेमी श्रोताओं ने अवगाहन स्नान किया।गौरतलब है कि आदि गंगा गोमती के तट पर बसे सुरम्य गांव खुनका में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया गया है।कथाव्यास पं.आनंदशास्त्री जी के श्रीमुख से सोमवार को सुखदेव द्वारा राजा परीक्षित की जिज्ञासा को उत्तम तरीके से शांति प्रसंग और भक्ति अजामिल की कथा का वर्णन किया गया। आकाशवाणी सुनकर आततायी कंस ने बहनोई बासुदेव और बहन देवकी को कारागार में बंद कर दिया,और नववें पुत्र से अपना बध होने के डर से सभी नवजात शिशुओं की हत्या करने का भी पाप किया ।श्री शास्त्री जी बताया कि कर्मो का फल मिलना निश्चित है।धरा को पापमुक्त करने के लिए भादों कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आधीरात प्रभु को अवतरित होना पड़ा।प्रभु की लीला का बखान करते हुए कथाव्यास ने कहा कि बासुदेव ने उफनाई यमुना जी को पार कर नंद जी के घर शिशु रूपी प्रभु को पहुँचाया। इधर नंद जी के घर लाला होने की खबर पूरे गोकुल में तेजी से फैल गई।दशो दिशाओं में बधाई एवं मंगलगीत होने लगे। कथा प्रसंग के दौरान आयोजक ध्रुव नारायण तिवारी सपत्नीक भगवान को माखन मिश्री का भोग लगया और आरती उतारी। भव्य झांकी देखकर और भजनों पर श्रोता गण थिरकने हुए खुशिया मनाई।एक दूसरे को बधाई दी।

आज की कथा में प्रह्लाद नारायण तिवारी, उदय नारायण तिवारी, दिप नारायण तिवारी, इन्द्र नारायण तिवारी, जय नारायण, पूर्व प्रधान रिखीराम मिश्र,शंकर प्रसाद यादव, शिव चन्द,नर्मदा प्रसाद,मानिक राम मिश्र,हनुमान तिवारी,पवन तिवारी, अमन, हरिशंकर शुक्ल,महेश पण्डित,बिमलेश तिवारी समेत सैकड़ो महिलाएं और श्रोता मौजूद रहे।कथा समापन आठ फरवरी को विशाल भंडारे के साथ होगा।






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गया, 19 फरवरी 2020, (आरएनआई )। विश्व में मुक्तिधाम के रूप में विख्यात पितरों के श्राद्ध अौर तर्पण के लिए बिहार के गया धाम से श्रेष्ठ कोई दूसरा स्थान नहीं है। मान्यता के अनुसार गया में भगवान विष्णु पितृ देवता के रुप में निवास करते हैं। कहा जाता है कि गया में श्राद्ध कर्म करने के पश्चात भगवान विष्णु के दर्शन करने से व्यक्ति को पितृ, माता अौर गुरु के ऋण से मुक्ति मिल जाती है। यहां अति प्राचीन विष्णुपद मंदिर स्थित है। इस मंदिर में भगवान विष्णु के पदचिन्ह आज भी मौजूद हैं। ये मंदिर फल्गु नदी के किनारे स्थित है। इसे धर्मशीला के नाम से जाना जाता है। इनके दर्शन से व्यक्ति को सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
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सामान्यतया ग्राम देवता का कोई नाम नहीं होता, उन्हें डीह बाबा, काली माई, बरहम बाबा के नाम से जानते है लोग
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पटना, 16 फरवरी 2020, (आरएनआई )। सामान्यतया ग्राम देवता का कोई नाम नहीं होता, उन्हें डीह बाबा, काली माई, बरहम बाबा के नाम से जानते हैं। इनका न कोई स्वरूप होता है और न ही इन्हें छत के नीचे रखा जाता है। गाँव के बाहर बड़ या पीपल के पेड़ के नीचे इनका निवास होता है। मिट्टी के लिपे पिण्ड या एक बड़े पत्थर को प्रतीक मानते हुए इनकी पूजा होती है। ब्रह्म बाबा गांव के चौकीदार देव होते हैं। हर शुभकार्य में उनका आशीर्वाद लिया जाता है। बचपन की मस्ती से लेकर जीवन के अंतिम क्षण तक ब्रह्म बाबा का वास जिस पीपल के पेड़ में होता है उसकी डालियों तक से जुड़ी होती है स्मृतियां। उस देवत्व पेड़ की छांव में काफी सुकून मिलता है.उसकी शीतल छाया मानो आशीष देती हो.समय के साथ सबकुछ बदल गया.गाँव अब अपनापन खो चुका.समय चक्र ने सबकुछ बदल दिया पर आज भी जो खास है जो अपने सम्मोहन से अपनी ओर खिंचते है वह है ब्रह्म बाबा. इनके दर से कोई खाली नहीं जाता यहां सबकी मुरादें पूरी होती मिट्टी में लोटते इंसान की किस्मत कैसे पलट जाती है यह हर वह इंसान देख चुका है जिसका जुड़ाव गांव से है व गांव के सबसे शक्तिशाली देवता ब्रह्म बाबा से भी.गर्मी की छुट्टियों में जब मैं गांव जाता था तब सोते वक्त मेरी दादी मुझे घर के पिछवाड़े लगे एक विशाल पीपल का पेड़ दिखाकर कहती कि बरहम बाबा यहीं बैठते हैं...झूठ बोलोगे तो बरहम बाबा बीमार कर सकते हैं...आम तोड़ने के लिए पेड़ पर चढ़ोगे तो पटक सकते हैं.....ठंड में जब आग जलती है तो तापते भी थे बरहम बाबा...और कभी गर्मी की दोपहरिया में अपने गंवई दोस्तों के साथ जब उस पीपल पेड़ के नीचे जाता तो सांय..सांय की आवाज के साथ मन में एक डर समा जाता कि गलत करुंगा तो बरहम बाबा यहीं पटक देंगे.यह सिर्फ़ अनुभूति नही है.पुराने यादों को फ़िर से ताज़ा करने का बहाना भर नही है . मन रुआंसा हो जाता है.
नगर रक्षिणी देवी है पटनेश्वरी
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पटना, 16 फरवरी 2020, (आरएनआई )। बिहार की राजधानी पटना में स्थित पटन देवी मंदिर शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र माना जाता है. देवी भागवत और तंत्र चूड़ामणि के अनुसार, सती की दाहिनी जांघ यहीं गिरी थी. नवरात्र के दौरान यहां काफी भीड़ उमड़ती है. सती के 51 शक्तिपीठों में प्रमुख इस उपासना स्थल में माता की तीन स्वरूपों वाली प्रतिमाएं विराजित हैं. पटन देवी भी दो हैं- छोटी पटन देवी और बड़ी पटन देवी, दोनों के अलग-अलग मंदिर हैं.
पति के अपमान से आहत होकर जहां यज्ञ कुंड में कूद पड़ी थी सती
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पटना, 14 फरवरी 2020, (आरएनआई )। अनादि काल से शक्ति उपासना की पुण्य भूमि बिहार के तीन शक्ति पीठों (गया सर्वमंगला, छिन्न मस्तिका, हजारीबाग, झारखंड तथा अम्बिका भवानी आमी दिघवारा सारण) में मूर्धन्य आमी वाली अम्बिका भवानी के सच्चे दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटता। चाहे दक्षिणमार्गी वैष्णवी शक्ति साधक हो या वाममार्गी कपालिनी के साधक। बहरहाल साधकों को सिद्धियां एवं श्रद्धालुओं की मुरादें पूरी करती हैं सर्वेश्वरी। चाहे शरद नवरात्र हो, बासंतिक नवरात्र हो या फिर चैत्र नवरात्र श्रद्धालुओं की भीड़ देखी जा सकती है.
यहां चिता की तपिश पर होती है साधना
Rupesh Kumar 2020-02-08 14:59:49
दरभंगा, 8 फरवरी 2020, (आरएनआई )। बिहार के दरभंगा जिले में मां काली का यह भव्य मंदिर मौजूद है, जिन्हें यहां भक्त श्यामा माई के नाम से पुकारते हैं. इस मंदिर के निर्माण की कहानी जिसे सुनकर सब हैरान हो जाते हैं. मां काली का यह मंदिर दरभंगा राज परिवार के महान साधक महाराज रामेश्वर सिंह की चिता पर बना है. इस मंदिर के अंदर दक्षिण दिशा की ओर एक खास स्थान पर आज भी लोग साधक महाराज रामेश्वर सिंह के चिता की तपिस को महसूस करते हैं, फिर चाहे कड़ाके की ठंड ही क्यों न पड़ रही हो.
भक्ति, साधना और ईश्वर के प्रति आसक्ति को कोई नहीं नकार सकता
Root News of India 2020-02-07 21:36:52
संत रविदासभक्तिकाल को हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग कहा जाता है और कहा भी क्यों न जाये आखिर कबीर, रैदास, सूर, तुलसी इसी युग की तो देन हैं जिन्होंने भगवान के सगुण और निर्गुण रूप को हर व्यक्ति तक पंहुचाया। यही वो दौर था जब इन संत कवियों ने मानवीय मूल्यों की पक्षधरता की और जन जन में भक्ति का संचार किया। इन्हीं में से एक थे संत रविदास। संत रविदास तो संत कबीर के समकालीन व गुरूभाई माने जाते हैं।संत रविदास का जन्मवैसे तो संत रविदास के जन्म की प्रामाणिक तिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं लेकिन अधिकतर विद्वान सन् 1398 में माघ शुक्ल पूर्णिमा को उनकी जन्म तिथि मानते हैं। कुछ विद्वान इस तिथि को सन् 1388 की तिथि बताते हैं। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि हर साल माघ पूर्णिमा को संत रविदास की जयंती मनाई जाती है। कहते हैं माघ मास की पूर्णिमा को जब रविदास जी ने जन्म लिया वह रविवार का दिन था जिसके कारण इनका नाम रविदास रखा गया। रविदास चर्मकार कुल में पैदा हुए थे इस कारण आजीविका के लिये भी इन्होंने अपने पैतृक कार्य में ही मन लगाया। ये जूते इतनी इतनी लगन और मेहनत से बनाते मानों स्वयं ईश्वर के लिये बना रहे हों। उस दौर के संतों की खास बात यही थी कि वे घर बार और सामाजिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़े बिना ही सहज भक्ति की और अग्रसर हुए और अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए ही भक्ति का मार्ग अपनाया।
सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा में पधारे वृन्दावन से प्रख्यात कथा वाचक
Pranjal Gupta 2020-02-07 17:19:11
पीलीभीत, 7 फरवरी 2020, (आरएनआई )। यूपी के पीलीभीत जिले में शहर की गोदावरी कालोनी में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस में बृन्दावन से पधारे प्रख्यात कथा वाचक परमादरणीय सुधीर कृष्ण उपाध्याय ने दिव्य भाव प्रकट किए। जिसमे बताया कि मानव का कल्याण मात्र भागवत के श्रवण से है। श्रीमद्भागवत कथा एक ऐसा वृक्ष है जिसकी छाया में आप पूर्ण मनोयोग से भजन चिंतन श्रावन करे तो संसार रूपी भव से तो पार होंगे ही अपितु भगवान की अलौकिक लीला के दर्शन भी प्राप्त होते है। ऐसे कितने भक्तो के प्रसंग है जो इस संसार मे आज भी भक्ति से भगवान से साक्षात्कार करते है और उनकी कृपा रूपी छाया का दर्शन करते है।""।।दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करे न कोई।।
सुलतानपुर:-नंद घर आनंद भयो..जय कन्हैया लाल की खुनका में बह रही भागवत कथा की रसधार
Shyam Chandra Srivastav 2020-02-04 12:44:39
सुल्तानपुर, 4 फरवरी 2020, (आरएनआई )। विकासखंड धनपतगंज के खुनका बहादुरपुर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन भगवान श्रीकृष्ण जी का प्राकट्य उत्सव हुआ।भव्य झांकी और मंगलगीत के साथ सुंदर भजनों से पूरा माहौल भक्ति मय हो गया। संगीतमयी कथा रूपी गंगा में भगतप्रेमी श्रोताओं ने अवगाहन स्नान किया।गौरतलब है कि आदि गंगा गोमती के तट पर बसे सुरम्य गांव खुनका में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया गया है।कथाव्यास पं.आनंदशास्त्री जी के श्रीमुख से सोमवार को सुखदेव द्वारा राजा परीक्षित की जिज्ञासा को उत्तम तरीके से शांति प्रसंग और भक्ति अजामिल की कथा का वर्णन किया गया। आकाशवाणी सुनकर आततायी कंस ने बहनोई बासुदेव और बहन देवकी को कारागार में बंद कर दिया,और नववें पुत्र से अपना बध होने के डर से सभी नवजात शिशुओं की हत्या करने का भी पाप किया ।श्री शास्त्री जी बताया कि कर्मो का फल मिलना निश्चित है।धरा को पापमुक्त करने के लिए भादों कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आधीरात प्रभु को अवतरित होना पड़ा।प्रभु की लीला का बखान करते हुए कथाव्यास ने कहा कि बासुदेव ने उफनाई यमुना जी को पार कर नंद जी के घर शिशु रूपी प्रभु को पहुँचाया। इधर नंद जी के घर लाला होने की खबर पूरे गोकुल में तेजी से फैल गई।दशो दिशाओं में बधाई एवं मंगलगीत होने लगे। कथा प्रसंग के दौरान आयोजक ध्रुव नारायण तिवारी सपत्नीक भगवान को माखन मिश्री का भोग लगया और आरती उतारी। भव्य झांकी देखकर और भजनों पर श्रोता गण थिरकने हुए खुशिया मनाई।एक दूसरे को बधाई दी।
संसार अपने स्वार्थ में करता है प्रेम : जगतगुरु
Rupesh Kumar 2020-02-03 20:07:33
मुजफ्फरपुर/बंदरा, 3 फरवरी 2020, (आरएनआई )। भगवान तब प्रेम करते है, जब हमारे पास कुछ नही रह जाता है. संसार तो अपने स्वार्थ के लिए प्रेम करता है।केवल भगवान का संबंध ही सास्वत है, संसार में संबंध नही अनुबंध होते है। जब तक हम ईश्वर से संबंध नही बनाएंगे तब तक ईश्वर को प्राप्त नही कर सकते है। अपने जीवन मे कोई भी प्राणी कितना भी पढ़-लिख कर ज्ञान प्राप्त करले, जब तक जीवन मे सीताराम के चरणों की भक्ति नही मिलती तब तक जीवन मे शांति की प्राप्ति नही हो सकती। उक्त बातें जगतगुरु श्रीरामभद्राचार्य जी महाराज ने मतलुपुर के बाबा खगेश्वरनाथ मंदिर प्रांगण में आयोजित श्रीराम कथा के दौरान कही.
अपने मन, कर्म और वचन से संकल्पित होकर लें सर्व जन की सेवा व सहयोग की साधना : गरिमा
Rupesh Kumar 2020-01-30 16:09:05
बेतिया, 30 जनवरी 2020, (आरएनआई )। नप सभापति गरिमा देवी सिकारिया ने अपने गृह वार्ड 24 में बनी माँ सरस्वती की प्रतिमा का गुरुवार को समारोह पूर्वक पूजन किया। इसके मौके पर पहुंचे श्रद्धालु महिला-पुरुषों से उन्होंने कहा कि विद्या की देवी मां सरस्वती उपासना के दिन आज हमें अपने मन, कर्म और वचन से संकल्पित होना है कि हमारा जीवन जन जन की सेवा व सहयोग की साधना बन जाय। तभी हमारा ज्ञान और हमारी विद्या सार्थक होगी। उन्होंने बताया कि आज माघ शुक्ल पंचमी तिथि को शास्त्रों में 'बसंत पंचमी' कहा गया है। इसे श्रीपंचमी और माँ सरस्वती के प्रकट होने का दिवस भी कहा और माना जाता है। इसी को लेकर हम बसन्त पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा उपासना करते आ रहे हैं। शास्त्रवत विधि विधान से विद्या व बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी की पूजा करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है। इस पूजन समारोह में वीणा केयाल, आभा देवी, सुशीला चतुर्वेदी, नितिन वर्णवाल, अनुराग चतुर्वेदी, ममता, निभा देवी, कांति देवी, नवेन्दु चतुर्वेदी आदि की सक्रिय सहभागिता रही.(रिपोर्ट-घनश्याम)
देश में मां शारदा का इकलौता मंदिर यहां आज भी आते हैं आल्हा और उदल
Rupesh Kumar 2020-01-29 20:12:53
सतना, 29 जनवरी 2020, (आरएनआई )। मध्य प्रदेश के सतना जिले में पर्वत की चोटी के बीच में ही शारदा माता का मंदिर है। भक्त यहां 1063 सीढ़ियां लांघ कर माता के दर्शन करने जाते हैं। पूरे भारत में सतना का मैहर मंदिर माता शारदा का अकेला मंदिर है। मैहर तहसील के पास त्रिकूट पर्वत पर स्थित इस मंदिर को मैहर देवी का मंदिर भी कहा जाता है। यहां माता के साथ देवी काली, दुर्गा, श्री गौरी शंकर, शेष नाग, श्री काल भैरवी, भगवान, फूलमति माता, ब्रह्म देव, हनुमान जी और जलापा देवी की भी पूजा की जाती है।अल्हा और उदल शारदा माता के बड़े भक्त हुआ करते थे। आल्हा और उदल वही हैं जिन्होनें पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध किया था। ऐसा कहा जाता है कि इन दोनों के द्वारा ही सबसे पहले जंगलों के बीच शारदा देवी के मंदिर की खोज की गई थी। फिर आल्हा ने इस मंदिर में 12 सालों तक तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें अमरत्व का आशीर्वाद दिया था। आज भी यह मान्यता है कि माता शारदा के दर्शन हर दिन सबसे पहले आल्हा और उदल ही करते हैं। मंदिर के पीछे पहाड़ों के नीचे एक तालाब है। तालाब से 2 किलोमीटर आगे जाने पर एक अखाड़ा मिलता है, जिसके बारे में ये मान्यता है कि यहां आल्हा और उदल कुश्ती लड़ा करते थे। मंदिर के पीछे वाले तालाब को आल्हा तालाब कहा जाता है।माना जाता है कि राजा दक्ष प्रजापति की पुत्री सती शिव से विवाह करना चाहती थी। लेकिन राजा दक्ष को ये मंजूर नहीं था। शिव के बारे में उनकी धारणा थी कि वे भूतों और अघोरियों के साथी हैं। लेकिन सती नहीं मानी और उन्होंने अपनी जि़द पर भगवान शिव से विवाह कर लिया। बाद में राजा दक्ष ने एक यज्ञ करवाया। जिसमें शामिल होने के लिए ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को बुलाया गया पर जान-बूझकर भगवान शंकर को इससे दूर रखा गया और वो नहीं आ पाए। दक्ष की पुत्री और शंकर जी की पत्नी सती इससे बहुत आहत हुईं।जब दक्ष द्वारा शिव को नहीं बुलाया गया तो यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता से शंकर जी को आमंत्रित नहीं करने का कारण पूछा। इस पर दक्ष द्वारा भगवान शंकर को अपशब्द कहा गया। ये बात सती को अपमानित लगी और उन्होंने दुखी होकर यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी जान दे दी। जब भगवान शंकर को इस दुर्घटना का पता चला तो क्रोध से उनका त्रिनेत्र खुल गया।फिर गुस्से में शिव ने यज्ञ कुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कर कंधे पर उठा लिया और तांडव करने लगे। जिसके बाद ब्रह्मांड पर खतरा मंडराने लगा और फिर सृष्टि की भलाई के लिए भगवान विष्णु ने सती के शरीर को 52 भागों में बांट दिया। जहां-जहां सती के अंग गिरे वहां शक्तिपीठों बन गए। अगले जन्म में सती ने हिमवान राजा के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या कर शिवजी को फिर से पति रूप में प्राप्त हो गई। ऐसी मान्यता है कि यहीं माता का हार गिरा था। हालांकि, सतना का ये मैहर मंदिर शक्ति पीठ तो नहीं है। लेकिन लोगों की आस्था इस कदर है कि यहां सालों से माता के दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ लगी रहती है।माता शारदा की मूर्ति की स्थापना विक्रम संवत 559 में की गई थी। मूर्ति पर देवनागरी लिपि में शिलालेख भी अंकित है।जहां बताया गया है कि सरस्वती के पुत्र दामोदर ही कलियुग के व्यास मुनि कहे जाएंगे। दुनिया के जाने-माने इतिहासकार ए कनिंग्घम ने इस मंदिर पर विस्तार से शोध किया है। इस मंदिर में पुराने समय से ही बलि देने की प्रथा है। लेकिन 1922 में सतना के राजा ब्रजनाथ जूदेव ने पशु बलि को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया. मंदिर के पास से ही येलजी नदी बहती है.(रिपोर्ट-अनूप नारायण सिंह)
ରଟନ୍ତି କାଳୀପୂଜାରେ ଝଲସୁଛି ଅସୁରାଳି
Laxmikanta Nath 2020-01-28 20:09:14
ଭଦ୍ରକ : ଭଦ୍ରକ ଜିଲା ଧାମନଗର ବ୍ଲକ ଅସୁରାଳିରେ ଶନିବାର ରାତିରୁ ଆରମ୍ଭ ହୋଇଛି ମା’ ରଟନ୍ତି କାଳୀପୂଜା। ଏଥିପାଇଁ ଅସୁରାଳି ଉତ୍ସବମୁଖର ହୋଇଥିବାବେଳେ ବିଭିନ୍ନ ସାଜସଜ୍ଜା ଓ ରଙ୍ଗିନ ଆଲୋକମାଳାରେ ଝଲସୁଛି। ବିଭିନ୍ନ ଅଞ୍ଚଳରୁ ଶ୍ରଦ୍ଧାଳୁମାନେ ଆସି ମା’ଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କରୁଛନ୍ତି। ଅସୁରାଳି, ଫତେପୁର, ଗୋବିନ୍ଦପୁର, କଲ୍ୟାଣୀ ଓ କୋଠାର ଆଦି ପଞ୍ଚାୟତବାସୀଙ୍କ ସହଯୋଗରେ ଏହି ସାର୍ବଜନୀନ ପୂଜା ପାଳିତ ହୋଇଆସୁଛି। ଅସୁରାଳି ବଜାର ବଣିକ ସଂଘ ଏବଂ ପୂଜା କମିଟି ଆନୁକୂଲ୍ୟରେ ଚଳିତବର୍ଷ ମା’ଙ୍କ ପୂଜା ଧୁମ୍‌ଧାମ୍‌ରେ ପାଳନ ହେଉଛି। ପ୍ରତିଦିନ ଚଣ୍ଡୀପାଠ, ଦେବୀ ବଗଳାମୁଖୀଙ୍କ ଆବିର୍ଭାବ, ଦିନବେଳା ଖିଚୁଡ଼ି ପ୍ରସାଦ ବଣ୍ଟନ ସହିତ ପ୍ରତ୍ୟହ ସନ୍ଧ୍ୟା ଆଳତି ମୁଖ୍ୟ ଆକର୍ଷଣ ସାଜିଛି। ଏହି ସମୟରେ ଆଳତି ଦର୍ଶନ ପାଇଁ ହଜାର ହଜାର ଭକ୍ତଙ୍କ ସମାଗମ ହେଉଛି। ସେହିପରି ସନ୍ଧ୍ୟାରେ ପ୍ରବଚନ, ଭଜନସନ୍ଧ୍ୟା, ବିଦ୍ୟାଳୟ ସ୍ତରୀୟ ପ୍ରତିଯୋଗିତା, ନୃତ୍ୟ ସଙ୍ଗୀତ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ସହିତ ଅପେରା ପ୍ରଦର୍ଶନ ବ୍ୟବସ୍ଥା ହୋଇଥିବା କମିଟି ସଭାପତି ଡା. ସଦାନନ୍ଦ ଦାସ, ଉପସଭାପତି ହରିହର ବେହେରା, ସମ୍ପାଦକ ଅଜୟ ସ୍ବାଇଁ ଓ ସହସମ୍ପାଦକ ଅମୂଲ୍ୟ ବେହେରା ସୂଚନା ଦେଇଛନ୍ତି। ଆସନ୍ତା ୪ ତାରିଖରେ ଭସାଣି ଅନୁଷ୍ଠିତ ହେବ ବୋଲି କମିଟି ପକ୍ଷରୁ କୁହାଯାଇଛି। ଉଲ୍ଲେଖନୀୟ ଯେ, ଅସୁରାଳିର ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଦେବୀ ଆଶ୍ରମର ପ୍ରତିଷ୍ଠାତା ସ୍ବର୍ଗତ ବାବା ବୈରାଗୀ ପିଲାଦିନରୁ ମା’ ବିରଜାଙ୍କ ବଡ଼ ଭକ୍ତ ଥିଲେ। ମା’ ବିରଜାଙ୍କ ପୀଠରେ ଦିନେ ସ୍ବପ୍ନରେ ବାବା ଭୈରବାନନ୍ଦଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କରି ମା’ ରଟନ୍ତି କାଳୀଙ୍କୁ ପୂଜା ପାଇଁ ନିର୍ଦ୍ଦେଶ ପାଇଥିଲେ। ହିମାଳୟର ନନ୍ଦନ ଯାଇ ବାବା ଭୈରବାନନ୍ଦଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କରି ତାଙ୍କର ଶିଷ୍ୟତ୍ୱ ଗ୍ରହଣ କରିଥିଲେ। ତାଙ୍କଠାରୁ ରଟନ୍ତି କାଳୀଙ୍କ ବିଷୟରେ ଅବଗତ ହୋଇ ସେଠାରୁ ଫେରି ଅସୁରାଳିରେ ମା’ଙ୍କ ପୂଜା ଆରମ୍ଭ କରିଥିଲେ। ପୌରାଣିକ ମତରେ ପାତାଳପୁରର ମହିରାବଣ ଏବଂ ଅହିରାବଣ ଦେବୀ ନିକୁମ୍ଭିଲାଙ୍କୁ ପୂଜାର୍ଚ୍ଚନା କରି ବଳି ପ୍ରଥା ପ୍ରଚଳନ କରିଥିଲେ। ରାବଣଙ୍କ ନିର୍ଦ୍ଦେଶରେ ରାମ ଏବଂ ଲକ୍ଷ୍ମଣଙ୍କୁ ହତ୍ୟା ପାଇଁ ଉଦ୍ୟମ ସମୟରେ ହନୁମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଦୁଇଭାଇ ବଧ ହୋଇଥିଲେ। ଏହାପରେ ପ୍ରଭୁ ରାମଚନ୍ଦ୍ର ଦେବୀ ନିକୁମ୍ଭିଲାଙ୍କୁ ପାତାଳପୁରରୁ ଉଦ୍ଧାର କରି ଉତ୍ତର ଓ ଦକ୍ଷିଣ ଭାରତରେ ମା’ ରଟନ୍ତି କାଳୀ ରୂପରେ ପୂଜା ଆରମ୍ଭ କରାଇଥିଲେ। ସାଧାରଣତଃ ମା’ କାଳୀଙ୍କ ମୃଣ୍ମୟୀ ମୂର୍ତ୍ତି ଶିବଙ୍କ ଛାତି ଉପରେ ବାମପାଦ ରଖିଥିବାବେଳେ ରଟନ୍ତି କାଳୀଙ୍କ କ୍ଷେତ୍ରରେ ଶିବଙ୍କ ଉପରେ ମା’ଙ୍କର ଦକ୍ଷିଣ ପାଦ ସ୍ଥାପନର ବିଶେଷତ୍ୱ ରହିଆସିଛି। ବାବା ବୈରାଗୀ ୧୯୫୨ରେ ମାଘ ଚତୁର୍ଦ୍ଦଶୀରେ ଅସୁରାଳିର ଗାନ୍ଧୀ କୁଟିରରେ ମା’ଙ୍କ ପୂଜା ଆରମ୍ଭ କରି ଏହାକୁ ସାର୍ବଜନୀନ କରିଥିଲେ। ପ୍ରଥମେ କାଠ ଘେରା ମଣ୍ଡପରେ ପୂଜା ଆରମ୍ଭ ହୋଇଥିଲା। ଏବେ ବିଶାଳ ପୂଜା ମଣ୍ଡପ, ସ୍ଥାୟୀ ଯାତ୍ରା ମଣ୍ଡପ ଓ ମନ୍ଦିର ପରିସର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଢଳେଇ ଦାଣ୍ଡ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଶୋଭା ପାଉଛି। ପୂଜା ପାଇଁ ଦୈନିକ ହଜାର ହଜାର ଶ୍ରଦ୍ଧାଳୁଙ୍କ ଭିଡ଼ ଜମୁଛି।
बिहार का एक ऐसा मंदिर जहां भक्तों को देना पड़ता है धरना, माता पूरी करते हैं मुरादे
Rupesh Kumar 2020-01-28 13:13:26
पटना, 28 जनवरी 2020, (आरएनआई )। हमारे देश में कई मंदिरें है, जिनकी अलग-अलग मान्यताएं हैं। आज हम आपको ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां 30 दिनों तक धरना देने पर हर मनोकामना पूर्ण हो जाती है। यह मंदिर बिहार के जमुई में है। यह मंदिर जमुई रेलवे स्टेशन के ठीक सामने ( मलयपुर ) है। इस मंदिर को जमुई का गौरव माना जाता है। इस काली मंदिर को मां नेतुला मंदिर ( Maa netula mandir jamui ) के नाम से जाना जाता है।इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि मां नेतुला ( mata netula ) के दरबार में आने वाले लोगों का नेत्र से संबंधित विकार दूर होता है। यही कारण है कि जमुई काली मंदिर में सालों भर नेत्र रोग से परेशान पुरूष और महिला श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। मान्यता है कि इस मंदिर में सच्चे भक्तिभाव से 30 दिनों तक धरना देने पर मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।(रिपोर्ट-अनूप नारायण सिंह)
साल के पहले अमावस्या को बाबा गरीबनाथ का भव्य श्रृंगार व आरती का किया गया आयोजन
Rupesh Kumar 2020-01-25 00:09:35
मुज़फ़्फ़रपुर, 25 जनवरी 2020, (आरएनआई )। मुजफ्फरपुर शहर के छाता बाजार स्थित बाबा गरीब नाथ मंदिर में भव्य श्रृंगार तिरंगा स्वरूप देकर महाकाल सेवा दल की ओर से किया गया. इस दौरान मंदिर के महंत अभिषेक पाठक ने भव्य श्रृंगार करते हुए विशाल आरती में भारी संख्या में भक्त रहे, आपको बता दें कि भक्तों की उपस्थिति में किया गया इस कार्यक्रम का आयोजन. इस दौरान महाकाल सेवा दल के शीर्ष मेंबर सहित सदस्य एवं भगवान के भक्त उपस्थित रहे. हर साल की तरह इस साल भी महाकाल सेवादल साल के पहले अमावस्या के अवसर पर इस तरह का भव्य श्रृंगार एवं आरती बाबा गरीबनाथ मंदिर का आयोजन करता है उसी कड़ी में किया गया भव्य श्रृंगार एवं आरती का आयोजन किया इस दौरान मौजूद रहे. महाकाल सेवादल के कार्यकर्ता और आने कई लोग मौजूद रहे.(रिपोर्ट-अभिषेक कुमार)
जहा माँ भगवती को चुनरी चढ़ाने से भक्तो की पुरी होती है मुराद
Rupesh Kumar 2020-01-20 15:50:46
पटना, 20 जनवरी 2020, (आरएनआई )। अंग क्षेत्र में शक्ति सिद्धि पीठ स्थल तिलडीहा दुर्गा मंदिर की प्रसिद्धी बिहार ही नही बल्कि झारखंड, बंगाल,यूपी,नेपाल आदि देश विदेश के कोने कोने तक फैली हुई है । वैसे तिलडीहा दुर्गा मंदिर का इतिहास 400 वर्ष प्राचीन का है . जो स्थापना काल से ही गौरवशाली रहा है . बंगाल राज्य के शांन्तिपुरा जिले के दालपोसा गांव के हरिवल्लव दास शक्ति के पूजारी थे . जहां वर्ष 1603 ई० में तांत्रिक विधि से 105 नरमुंड पर तिलडीहा स्थित बदुआ नदी के किनारे श्मशान घाट में माँ भगवती की स्थापना की थी . वर्तमान में उसी के बंशज इस मंदिर के मेंढ़पति योगेश चन्द्र दास है . बदलते समय के मुताबिक समय समय पर इस मंदिर का स्वरूप में भी परिवर्तन किया गया . जहां पूर्व में पुआल के मंदिर से खपड़ैल व फिर खपड़ैल से पक्के का बना दिया किन्तू मंदिर की अंदर की जमीन व प्रतिमा पिंड आद भी मिट्टी के ही है . जहां इस मंदिर को लोग आज भी खप्पड़वाली मां के नाम से जानते है . इस मंदिर की एक खास बिशेषता है कि यहां मां भगवती के खड़ग,व अरधा प्राचीन काल का है . जहां पहलि बलि मां भगवती को इस खड़ग से बंद मंदिर में मेंढ़पति के द्वारा ही दिया जाता है . यहां की एक और बिशेषता है कि यहां एक ही मेढ़ पर कृष्ण, काली,मां भगवती, सरस्वती, लक्ष्मी,के साथ साथ भगवान शंकर का प्रतिमा भी स्थापित किया जाता है जो देश के गिने चुने स्थानो पर है . यहां की ऐसा मान्यता है कि मां भगवती को लाल चुनरी बहुत ही प्रिय है जिसे चढ़ाने से भक्तो की मन्नते पुरी होती है . इसी आस्था व विश्वास के साथ श्रद्धालू यहां दशहरा के महाअष्टमी के साथ साथ प्रत्येक मंगलवार व शनिवार को बिहार,झारखंड, बंगाल,यूपी,नेपाल जैसे राज्यो के कोने कोने से बड़ी संख्या में श्रद्धालू यहां पहुंचकर मां भगवती को चुनरी चढ़ाकर मन्नते मांगते है . जहां मन्नते पुरी होने पर श्रद्धालू मां को खुश करने के लिए बकरे की बलि चढ़ाते है . यहां की भक्ति में शक्ति ऐसी है कि प्रत्येक साल इस मंदिर में तीस हजार से भी ज्यादा बकरे की बलि दी जाती है . तिलडीहा दुर्गा मंदिर में मां भगवती को नवरात्रा में प्रथम पूजा व महाअष्टमी को गंगा जल से जलाभिषेक करने की भी बहुत पुरानी परंम्परा है . ऐसी मान्यता है कि तिलडीहा दुर्गा मंदिर में मां भगवती को जल सहित जल पात्र चढ़ा देने से उन भक्तो पर मां की बिशेष कृपा रहती है . खासकर सुनी गोद के शिकार महिलाए द्वारा महाअष्टमी के दिन यहां मां भगवती को डलिया चढ़ाने से उनकी सुनी गोद संतान से भर जाती है वैसे श्रद्धालू को नौवमी के दिन इस मंदिर में मुंडन का अनुष्ठान कराना अनिवार्य हो जाता है . यह हर वर्ष हजारौ श्रद्धालूओ दुर -दुर से मुंडन का अनुष्ठान कराने आते है . शक्ति सिद्धि पीठ रहने के कारण बिहार ,झारखंड,बंगाल,यूपी,आदि राज्यो से सैकड़ो तांत्रिक तंत्र मंत्र विधा की सिद्धि के लिए अष्टमी को पहुचते है इतना बड़ा आयोजन में ग्रामीण व जिला प्रशासन के साथ साथ मुंगेर जिला प्रशासन का काफी सहयोग रहता है . करोड़ो का सालाना आय आने वाली यह मंदिर न तो किसी ट्रस्ट के अधीन है और न ही कोई आय व्यय का ब्यौरा ही उपलब्ध है . मेंढ़पति परिवार ही मंदिर में आने वाली करोड़ो रूपया की आय का संचय कर मंदिर को चलाते है .(रिपोर्ट-अनूप नारायण सिंह)
महेंद्र नाथ मंदिर : जहां पर होती है सबकी मनोकामनाएं पूर्ण
Rupesh Kumar 2020-01-20 12:01:44
पटना, 20 जनवरी 2020, (आरएनआई )। बिहार का बाबा महेंद्रनाथ मंदिर प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। नेपाल के राजा महेंद्र वीर विक्रम सहदेव ने मेंहदार में खूबसूरत मंदिर को बनवाया और इसका नाम महेंद्रनाथ रखा था। सीवान से लगभग 32 किमी दूर सिसवन ब्लॉक के मेंहदार गांव में स्थित भगवान शिव के महेंद्रनाथ मंदिर का निर्माण नेपाल नरेश महेंद्र ने 17वीं सदी में करवाया था। मंदिर आपपास के क्षेत्र के लोगों के अलावा देशी-विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। मेंहदार धाम बिहार का पर्यटक और ऐतिहासिक स्थल है। लगभग 500 वर्ष पुराना मेंहदार का महेंद्रनाथ मंदिर सबसे पुरानी धार्मिक स्थलों में है जो अब लोकप्रिय पर्यटक स्थल है। मुख्य मंदिर के पूर्व में सैकड़ों बड़े छोटे घंटी लटका है जो देखने में बहुत ही रमण्ीय लगता है। घंटी के सामने पर्यटक अपनी फोटो खिंचवाते हैं। भगवान गणेश की एक प्रतिमा भी परिसर में रखा गया है। उत्तर में मां पार्वती का एक छोटा सा मंदिर भी है। हनुमान की एक अलग मंदिर है, जबकि गर्भगृह के दक्षिण में भगवान राम, सीता का मंदिर है। काल भैरव, बटूक भैरव और महादेव की मूर्तियां मंदिर परिसर के दक्षिणी क्षेत्र में है। मंदिर परिसर से 300 मीटर की दूरी पर भगवान विश्वकर्मा का एक मंदिर है। मंदिर के उत्तर में एक तालाब है जिसे कमलदाह सरोवर के रूप में जाना जाता है जो 551 बीघा क्षेत्र में फैला हुआ है। इस सरोवर से भक्त भगवान शिव को जलाभिषेक करने के लिए पानी ले जाते हैं। इस सरोवर में नवंबर में कमल खिलते है और बहुत सारे साइबेरियाई प्रवासी पक्षियां यहां आते हैं जो मार्च तक रहते है। महाशिवारात्रि पर यहां लाखों भक्त आते हैं। उत्सव पूरे दिन पर चलता रहता है और भगवान शिव व मां पार्वती की एक विशेष विवाह समारोह आयोजित होता है। इस दौरान शिव बारात मुख्य आकर्षण होता है। मंदिर में खास-मंदिर में छोटे-बड़े आकार की सकड़ों घंटियां बहुत नीचे से ऊपर तक टगी है जिसको बच्चे आसानी से बजा सकते हैं। हर-हर महादेव के उद्घोष और घंट-शंख की ध्वनि से मंदिर परिसर से लेकर सड़कों पर भगवान शिव की महिमा गूंजती रहती है। दशहरा के पर्व में 10 दिनों तक अखंड भजन, संकीर्तन का पाठ होता है। इसके अलावा सावन में महाशिवरात्रि पर लाखों भक्त शिव जलाभिषेक करते हैं। सालों भर पर्यटक का आना जाना लगा रहता है।
सुलतानपुर: अघोरपीठ बाबा सत्यनाथ मठ का अवधूत देशना पर्व का हुआ समारोह पूर्वक समापन
Shyam Chandra Srivastav 2020-01-18 11:46:57
सुलतानपुर, 18 जनवरी 2020, (आरएनआई )। मकर संक्रांति के अवसर पर स्नान दान की धार्मिक मान्यता का वैज्ञानिक और खगोलीय आधार है।इसे हमे जानना भी चाहिए और दूसरो को बताना भी चाहिए।
10 जनवरी को चंद्र ग्रहण
Root News of India 2020-01-09 19:02:00
मथुरा, 09 जनवरी 2020, (आरएनआई )। पं. अजय तैंलग ने बताया कि 10 जनवरी के चंद्र ग्रहण को लेकर लोग कंफ्यूज हैं कि इस चंद्र ग्रहण पर सूतक लगेंगे या नहीं। दरअसल 10 जनवरी को लगने वाला चंद्र ग्रहण उपच्छाया चंद्र ग्रहण होगा। धर्मशास्त्र में इसे माद्य ग्रहण कहते हैं। इस ग्रहण में चंद्रमा पर ग्रहण नहीं लगता बल्कि इसका बिंब धुंधला हो जाता है। यह चंद्र ग्रहण दूसरे चंद्र ग्रहण से काफी कमजोर होगा। इसलिए धर्म शास्त्र में इसकी मान्यता नहीं है। भारत में इस ग्रहण का असर न के बराबर होगा। इस ग्रहण पर सूतक नहीं लगेंगे और मंदिरों के कपाट भी बंद नहीं होंगो। धार्णिक जानकारों के अनुसार इस ग्रहण को ग्रहण की कोटि में नही रखा जाता है।

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