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अपनी अलग सोच व काम के अलग अंदाज की वजह से एलिट इंस्टीच्यूट पहुंचा शिखर तक

Rupesh Kumar 2020-02-12 10:37:15    EDITORSPICK 2498
अपनी अलग सोच व काम के अलग अंदाज की वजह से एलिट इंस्टीच्यूट पहुंचा शिखर तक
पटना, 12 फरवरी 2020, (आरएनआई )। अपनी अलग सोच व काम के अलग अंदाज की वजह से अमरदीप झा गौतम ने एलिट इंस्टीच्यूट को शिखर तक पहुंचा दिया है. बच्चों के साथ सपने देखना, उसके सपने बुनना और फिर उन सपनों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए दिन-रात की मेहनत का ही नतीजा है कि हर साल एलिट इंस्टीच्यूट देश को बेहतर इंजीनियर और डॉक्टर देता रहा है.अगर 2019 के रिजल्ट पर नजर डालें, तो 178 जेईई मेन, 23 जेईई एडवांस्ड, 69 नीट-मेडिकल में और 2018 में 165 जी-मेन में, 30 बच्चे जी-एडवांस और नीट-2018 में 63 बच्चों को क्वालिफाइड करवा चुके अमरदीप झा गौतम का सफर काफी लंबा है।

18 सालों से हर दिन बच्चों के बीच रहते, उनसे फ्रेंडली बातें करते, उनकी प्रॉब्लम को सुनते और फिर उस प्रॉब्लम को दूर करने में लग जाते।

इस दौरान एक बार भी उनके चेहरे पर थकान का भाव नहीं आता।

एलिट इंस्टीच्यूट की सफलता के पीछे उनकी बेहतर सोच और बेहतर कर्म ही है कि वो आज बच्चों को बेहतर सुविधा के साथ-साथ बेहतर फ्यूचर प्रोवाइड करवा रहे हैं।

स्मार्ट स्टडी और प्रैक्टिकल-एप्रोच...

पटना में एलिट इंस्टीच्यूट ऐसा पहला हुआ, जो अपने बच्चों की सुविधा और उसके ज्ञान को उन्हीं की लैंग्वेज में समझाने का ट्रेंड शुरू कर पाने में सफल हो पाया। एलिट अपने स्टूडेंट्स के लिए स्मार्ट-स्टडी के साथ-साथ मॉडर्न स्टडी-पैकेज भी मुहैया करवा रहा है।

अब दसवीं पास स्टूडेंट्स को मेडिकल व इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए थ्री इयर कोर्स भी सबसे पहले यहीं शुरू करवाया जाएगा।

एलिट इंस्टीच्यूट के संस्थापक और डायरेक्टर अमरदीप झा गौतम ने बताया कि बच्चों के स्किल को अपडेट करने के लिए हर 45 दिनों पर बच्चों की काउंसिलिंग करायी जाती है।

इसमें स्टूडेंट्स की इनर्जी, उसका लेवल, उसकी समझदारी का आंकलन करने के बाद उसकी कमियों को दूर करने की दिशा में भी काम किया जाता है।

सिर्फ कोचिंग हीं नहीं बल्कि सेल्फ स्टडी के लिए लाइब्रेरी, डिस्कशन हॉल, ऑन लाइन और ऑफ लाइन सिस्टम के साथ-साथ इंग्लिश की पढ़ाई भी मुहैया करवायी जा रही है।

योग-विज्ञान और कल्पना-शक्ति के सदुपयोग के प्रयोग.

एलिट संस्थान एक ऐसा संस्थान हो पाया, जहाँ छात्र-छात्राओं को नियमित-रुप से योगासन, प्राणायाम और ध्यान के प्रयोगों से उनको शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संवर्धन का लाभ मिलता है। वहीं संस्थान के निदेशक अमरदीप झा गौतम का शोध "रिदमिक-एक्शन" के माध्यम से बच्चों को प्रकृति के साथ अपनी कल्पना-शक्ति को जोड़ना सिखाया जाता है।

जनरल लाइफ के एग्जांपल से प्रॉब्लम दूर...

कुछ स्टूडेंट्स की शिकायत रहती है कि वे सवाल करने से डरते हैं।

अगर सवाल करते हैं, तो सही जवाब नहीं मिल पाता है।

लेकिन, एलिट इंस्टीच्यूट में बच्चों को आने वाले सब्जेक्टिव परेशानी को जनरल लाइफ के एग्जांपल देकर समझाया जाता है।

एलिट इंस्टीच्यूट के डायरेक्टर अमरदीप झा गौतम ने बताया कि "मेरे इंस्टीच्यूट में टीचर और स्टूडेंट के बीच के गैप को कम किया जाता है. फ्रेंडली माहौल होने की वजह से बच्चे आसानी से अपनी पढ़ाई कर पाते हैं, साथ ही उनके सवालों का सही- सही जवाब भी दिया जाता है"।

12 टीचर और 10 नन टीचिंग स्टॉफ के साथ मॉडर्न टीचिंग हब के रुप में तब्दील हो चुका एलिट इंस्टीच्यूट बच्चों के सवालों के जवाब पर खरा उतर रहा है। यहाँ पर इंजीनियरिंग और मेडिकल दोनों के ही एक्सपर्ट द्वारा इसकी पढ़ाई करवायी जाती है।

विरासत में मिला शिक्षण कार्य...

बेगूसराय के सांस्कृतिक व सामाजिक परिवेश से आगे बढ़ने के बाद अमरदीप झा गौतम पटना साइंस कॉलेज और बी.एच.यू. से अपनी पढ़ाई करने के बाद संघ लोकसेवा आयोग के लिये चुने गये, पर उन चीजों में मन नहीं लगने के कारण शिक्षण-कार्य में जुट गये।

अमरदीप झा गौतम के माँ और पिताजी भी बिहार-सरकार के सेवा-निवृत शिक्षक हैं, जिन्होनें लगभग 28 वर्षों तक बिहार की शिक्षा में अपना योगदान दिया।

ऐसे में श्री गौतम ने शिक्षण का दायित्व विरासत के तौर पर ग्रहण किया।

वह फिजिक्स के विख्यात शिक्षक हैं और बच्चों को खेल-खेल में फिजिक्स को आसान बना कर समझाने के हुनर में माहिर हैं।

फिजिक्स से सोशल एक्टिविटी तक...

एलिट इंस्टीच्यूट के डायरेक्टर अमरदीप झा गौतम को जब भी मौका लगता है कि वो सोसायटी के गंभीर मसलों पर अपनी कलम भी भिंगोने लगते हैं।

फिजिक्स के जानकार अमरदीप झा गौतम एक साथ कई विधाओं में महारत रखते हैं।

मसलन कि उनकी लिखी नाटक 'आम्रपाली', 'सुदामा', 'मेरी आवाज', 'चंदर-पृथ्वी', 'शबरी' 'सीता' और 'द्रौपदी' ने उनकी लेखनी और उनके विचारों को बहुआयामी सिद्ध किया।

वहीं उनकी कवितायें, शायरी की बेहद रोमांचकारी प्रस्तुति लोगों को झूमने पर विवश कर देती है।

गाना लिखने का शौक और उसकी अदायगी एलिट इंस्टीच्यूट के एनुअल-फंग्शन में दिख जाती है।

एनुअल फंक्शन की मस्ती...

एनुअल फंक्शन में अपने लिखे गीत, नाटक, भाषण और काव्य पाठ के साथ उसे बच्चों की आवाज में पिरोकर पेश करवाया जाता है।

समाज के विभिन्न-वर्गों के विभूतियों और देश के लिये समर्पित व्यक्तियों को "सरस्वती-सम्मान", "प्रतिभा-सम्मान" और "बाबा-नागार्जुन सम्मान" से अलंकृत किया जाता है।

स्वभाव से निर्मल अमरदीप झा गौतम ने बताया कि हरेक के अंदर एक्टर छिपा रहता है. ऐसे में उसे उभार कर निकालने का दायित्व भी हम जैसे लोगों का ही है, इसलिए इस दिन को भी बच्चे काफी यादगार बनाते हैं और मैं भी इसमें जमकर जुट जाता हूँ।

मेधावी बच्चों को दी जाने वाली सुविधाएं...

– ज्ञानोदय योजना के अंतर्गत एलिट-21 प्रोग्राम चलाया जाता है।

इसमें वैसे 21 बच्चों का सेलेक्शन किया जाता है जो गरीब होते हैं।

उनके अंदर जबरदस्त मेधा रहती है, साथ ही उसके घर की वार्षिक आय एक लाख या उससे कम हो।

– गरीब बच्चों के लिए 25 परसेंट की स्कॉलरशिप दी जाती है.

– लड़कियों को पूरे साल बीस परसेंट की छूट उपलब्ध करवायी जाती है.

– 2019 से ग्रामीण-परिवेश के स्टूडेंट्स को कंप्यूटर की पढ़ाई और ऑनलाइन-टेस्ट के प्रैक्टिस के लिये कंप्यूटर-लैब की व्यव्स्था की जायेगी।

– प्रैक्टिकल-एप्रोच से फिजिक्स, केमेस्ट्री, मैथ और बायोलॉजी पढ़ाया जाता है।

सम्मान और पुरस्कार...

2012 में स्थानीय न्यूज चैनल की ओर से बेस्ट मोटिवेटर का अवार्ड मिल चुका है।

2013 में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के समूह द्वारा युवा शिक्षा सम्मान।

2014 में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए शिक्षा-रत्न पुरस्कार ।

2015 में आईनेक्सट-अखबार के द्वारा एजुकेशनल एचिवर्स-अवार्ड।

2015 में केन्द्रीय शिक्षा राज्यमंत्री से सरस्वती-सम्मान।

2016 में पत्र-पत्रिकाओं द्वारा लालबहादुर शास्त्री सम्मान।

2016 में युवा विज्ञान-विश्लेषक सम्मान।

2017 में जागरण-समूह द्वारा गुरु-सम्मान।

2018 में गैर-सामाजिक संगठन द्वारा युवा-दार्शनिक सम्मान।

2018 में चंपारण में युवा-कविरत्न सम्मान।

प्रोफाइल :

नाम- अमरदीप झा गौतम

प्रख्यात शिक्षाविद, फिजिक्स-टीचर, कॅरियर-काउंसलर, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता, राजनीति-विश्लेषक सामाजिक चिंतक और एलिट इंस्टीच्यूट के संस्थापक और निदेशक ।

अमरदीप झा गौतम के बारे में कुछ खास बातें:

पिता – श्री तेज नारायण झा.

माता – श्रीमति नगीना झा.

जन्म तिथि – 12 फरवरी, बेगूसराय.

शौक – भौतिकी पढ़ाना, काव्य-लेखन और वाचन, गजल लिखना, किताबें पढऩा, सामाजिक-जागरुकता को बढ़ाना।

फेवरेट मूवी – पेज थ्री, आँधी, ब्लैक, डोर, पिंजर, आमिर, बाहुबली, मणिकर्णिका.

बेस्ट एक्टर – अमिताभ बच्चन.

बेस्ट एक्ट्रेस – कोंकणा सेन और कंगना राणावत.

गजल – जगजीत सिंह और गुलाम अली.

फेवरेट नॉवेल – कर्मभूमि, गोदान, दिनकर और निराला की कवितायें, जयशंकर प्रसाद की कामायनी, वाजपेयी जी की मेरी "इक्यावन कवितायें" का संग्रह शामिल हैं।

इंस्पायरिंग पर्सन – अमिताभ बच्चन, हरेक पल ऐसा लगता है कि वो कुछ न कुछ सीख रहे हैं… जिज्ञासा है।

आंधियां बहुत तेज हैं कुछ दीप झिलमिलाते हैं !

ये वही हैं जो अंधेरों से रौशनी चीर लाते हैं !!



(रिपोर्ट-अनूप नारायण सिंह)









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गया, 12 फरवरी 2020, (आरएनआई )। अठाईस बरसों का दर्द अब बन गया है नासूर, 28 वर्षों पूर्व गया के बारा में हुए नरसंहार में जो दर्द उभरी हुई थी वह अभी तक ताजा है। सुनी मांग और सुनी कोख का दर्द लिए बारा की आबोहवा में आज भी दर्द सिसकियां समाहित है।गया जिले की टिकारी प्रखंड अंतर्गत बारा गांव के लोग आज भी 28 साल पहले 12 फरवरी 1992 की उस मनहूस रात को याद कर सिहर जाते हैं। इसी रात को गांव के पश्चिमी हिस्से से आए हथियारबंद दर्जनों दरिदों ने 35 लोगों की गला रेतकर हत्या कर दी थी। बीच-बचाव में आई महिलाओं को हथियार की बट से बेरहमी से पीटा गया था। महिलाओं ने अपनी आंखों के सामने अपने सुहाग को मिटते देखा। किसी ने बेटा खोया तो कइयों के सिर से पिता का साया उठ गया।बारा नरसंहार ने तत्कालीन राज्य सरकार की कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाया था। सरकार ने मृतकों परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की थी। साथ ही एक-एक लाख रुपये देने की भी घोषणा की गई थी, जो मिल गई।गांव के सत्येंद्र शर्मा बताते हैं, नरसंहार के बाद 22 परिवारों को नौकरी मिली, जबकि सभी 35 लोगों के आश्रित को नौकरी देने की घोषणा हुई थी। स्व. शिवजन्म सिंह, स्व. रामअकबाल सिंह, स्व. भुसाल सिंह, स्व. आसुदेव सिंह, स्व. बलिराम सिंह समेत कई अन्य के आश्रित को नौकरी नहीं मिली है।राज्य सरकार ने गांव की सुरक्षा के लिए थाना खोलने से लेकर तमाम विकास योजनाएं पहुंचाने का भरोसा दिया था। गांव में कई मृतकों के आश्रित तत्कालीन सरकार की घोषणा और आज की मौजूदा स्थिति पर असंतुष्टि जताते हैं। बारा नरसंहार में अपने पिता समेत दो चाचा और पांच चचेरे भाई को खोने वाले सत्येंद्र शर्मा कहते हैं कि घटना के बाद सरकार ने पुलिस सुरक्षा बढ़ाते हुए 20 बीएमपी का एक कैंप बनाया था। वह भी साल 1999-2000 में हटा लिया गया। गांव में थाना खोलने के लिए ग्रामीणों ने करीब छह कट्ठा जमीन भी दी है, लेकिन अब तक थाना नहीं बना। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क जैसी योजनाएं भी दुरुस्त नहीं हैं। सत्येंद्र सिंह कहते हैं, सड़क जर्जर हाल में है। दो कमरों में मध्य विद्यालय चल रहा है। अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का सही लाभ भी ग्रामीणों को नहीं मिलता। सलेमपुर गांव के बाके बिहारी शर्मा कहते हैं, जिस हिसाब से आश्रितों का कल्याण होना चाहिए था, नहीं हुआ। गांव में विकास योजनाओं को अच्छी तरह से पहुंचाने की जरूरत है।वहीं, जिलाधिकारी अभिषेक सिंह ने कहा कि बारा गांव में विकास योजनाओं की जांच कराकर उसे और बेहतर किया जाएगा।अखिल भारतीय राष्ट्रवादी किसान संगठन के प्रवक्ता सत्येंद्र शर्मा कहते हैं, हत्या के सभी अभियुक्तों को फांसी की सजा मिलनी चाहिए थी, जो नहीं मिली। सत्येंद्र शर्मा घटना के साल में रांची में अपने मामा जी के यहां रहते थे। जिन चार लोगों को फंासी होनी थी उसकी सजा उम्र कैद में बदल दी गई.(रिपोर्ट-अनूप नारायण सिंह)
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संघर्षों के बल पर प्रशस्त किया है सफलता का मार्ग
Rupesh Kumar 2020-02-06 10:13:27
पटना, 6 फरवरी 2020, (आरएनआई )। संघर्ष जितना कठिन होगा सफलता का स्वाद उतना ही मीठा होगा चिकित्सा समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले चिकित्सक डॉ विजय राज सिंह को सारण हेल्पलाइन सारण गौरव सम्मान से सम्मानित करने का निर्णय लिया है।इस आशय की जानकारी सारण हेल्पलाइन की अध्यक्ष डॉक्टर सुजाता ने दी। उन्होंने बताया कि हॉकी कोच हरेंद्र सिंह लोक गायिका देवी फिल्म स्टार अखिलेंद्र मिश्रा पत्रकार राणा यशवंत समेत सारण प्रमंडल के 21 विभूतियों को 15 मार्च को पटना में भव्य समारोह का आयोजित कर सम्मानित किया जाएगा. कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि बिहार के राज्यपाल को निमंत्रण भेजा गया है.छपरा जिले के एकमा प्रखंड के सरयूपार गांव के एक गरीब किसान परिवार में जन्म लेने वाले डा. विजयराज सिंह आज बिहार के श्रेष्ठ चिकित्सको में शुमार है. भूख गरीबी काफी करीब से देखने वाले डा सिंह ने बड़े पैकेज वाले नौकरी करने अपेक्षा बिहार को ही अपना कार्य क्षेत्र बनाया . दो दशकों में इन्होंने हजारो गरीबों के सपने ही नहीं पूरे किए हमें दी आशा की एक किरण. डॉ विजय पाल सिंह बिहार के ख्याति प्राप्त चिकित्सक होने के साथ ही साथ बहुयामी व्यक्तित्व के स्वामी जी भी है. ये अखिल भारतीय क्षत्रिय महा सभा के बिहार के प्रदेश अध्यक्ष हैं साथ ही साथ ग्लोबल राज प्रोडक्शन हाउस के माध्यम से इन्होंने एक साथ छह भोजपुरी फिल्मों के निर्माण की प्रक्रिया भी प्रारंभ की है जिसमें से एक फिल्म सच्चाई हमार जिंदगी बनकर तैयार है जिसका प्रदर्शन इस वर्ष ही होना है. पटना के गोला रोड में इनका अस्पताल राज ट्रामा सेंटर चौबीसों घंटे गरीब असहाय मरीजों की सेवा के लिए तत्पर रहता है .अस्पताल में एक साथ 60 से ज्यादा चिकित्सक जुड़े हुए हैं .यहां गंभीर रोगों के इलाज के साथ ही साथ सामान्य रोगों का भी सुचारू पूर्ण ढंग से इलाज होता है. शिक्षा के क्षेत्र में गरीब और ग्रामीण परिवेश के छात्रों को आधुनिक शिक्षा देने के लिए डॉक्टर विजय राज सिंह ने बिहार के हाजीपुर में शांतिनिकेतन नाम से सीबीएसई से संबद्ध 12वीं तक मान्यता प्राप्त विद्यालय की स्थापना की है .फिलहाल इस विद्यालय में 5000 छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं. बिहार के औरंगाबाद में एक भव्य मंदिर का निर्माण भी डॉक्टर विजय राज जी करवा रहे है.जो अपने निर्माण काल से ही चर्चा केंद्र बिंदु में है .इसके निर्माण पर अब तक एक करोड़ से ज्यादा की राशि खर्च हो चुका है . मंदिर के निर्माण में में सहयोग कर सराहनीय कार्य किया है. प्रतिवर्ष दर्जनों गरीब कन्याओं का विवाह करवाना ,सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना भी इनकी आदतों में शुमार है.बातचीत के क्रम मे इन्होने बताया कि उन्होंने गरीबी भूखा अभाव काफी नजदीक से देखा है.उन्होंने खुद के बल पर समाज को आगे बढ़ाने का प्रण कर रखा हैं इसी जज्बे के साथ अपनी ग्लोबल राज ग्रुप ऑफ कंपनी बनाकर चिकित्सा शिक्षा फिल्म निर्माण व विविध क्षेत्र में कार्य करना प्रारंभ किया है. साथ ही साथ में हजारों नौजवानों को रोजगार प्रदान किया है. राजनीति में आने के सवाल पर वे कहते हैं कि अगर आप की नीति सही है तो आप राजनीति में है.सभी दलों में उनके चाहने वाले लोग हैं और सभी दलों के राजनेताओं से वे संबंध रखते हैं .खुद राष्ट्रवादी हैं धार्मिक अनुष्ठानों में भी भाग लेते हैं सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं क्षत्रिय समाज से आते हैं इस कारण समाज के उत्थान के लिए कार्य करते हैं .एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया की हॉस्पिटल स्कूल फिल्म प्रोडक्शन व अन्य 15 इकाइयों के द्वारा प्रतिदिन जो आय होती है उसका 10 फिसदी हिस्सा वे समाज कल्याण के लिए निकालकर अलग रख देते है समाज के उत्थान के लिए सामाजिक कार्य करने वाले लोगों के लिए उनका दरवाजा चौबीस घंटे खुला रहता है .भोजपुरी भाषा में फिल्म निर्माण के क्षेत्र में धमाके के साथ उतरने के सवाल पर उन्होंने कहा कि भोजपुरी दुनिया की सबसे मीठी भाषा है पर कुछ लोग इस भाषा को बदनाम करने और अश्लीलता का पर्याय बनाने में लगे हुए इसी कारण उन्होंने काफी सोच समझ के भोजपुरी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में पदार्पण किया है.सच्चाई हमार जिंदगी पहली फिल्म है इसके बाद लगातार बैक टू बैक पांच फिल्मों का निर्माण होना है. भोजपुरी फिल्म और गीत संगीत में फैली अश्लीलता पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि सेंसर बोर्ड भी अब विवादों के साए में है सेंसर के नीति और नीयत पर सवाल उठने लगे हैं अगर सेंसर है तो फिर गंदगी कैसे बाहर निकल कर आ रही है. उन्होंने बिहार सरकार से मांग की कि राज्य सरकार अध्यादेश लाकर शराबबंदी की तरह अश्लील और गंदे गानों का प्रचार-प्रसार और प्रसारण बिहार में पूरी तरह प्रतिबंधित करें.(रिपोर्ट-अनूप नारायण सिंह)
क्षत्रिय संगठन को एकीकृत करने के लिए बिहार प्रदेश के अध्यक्ष चला रहे है अभियान
Rupesh Kumar 2020-02-05 12:10:09
पटना, 5 फरवरी 2020, (आरएनआई )। देश पर जब जब संकट के बादल छाए हैं, देश के अस्मिता पर प्रहार हुआ है, क्षत्रियों ने अपना जान हथेली पर रख अपने प्राणों की आहुति दी है.देश की बलिवेदी पर शहीद हुए है यह कहना है अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा बिहार प्रदेश के अध्यक्ष डॉ विजय राज सिंह का .विजय राज सिंह बिहार के क्षत्रीय संगठनों को एकीकृत करने के लिए अभियान चला रहे हैं. उन्होंने बिहार के 38 जिलों का दौरा कर तमाम छोटे-बड़े क्षत्रिय संगठनों को एकजुट करने की दिशा में प्रयास किया है. उनका कहना है.देश के आजादी के बाद देश के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने वाले समाज के साथ राजनैतिक रूप से अन्याय किया गया है। जिस जाति ने अपना सब कुछ देश के लिए लुटा दिया उस जाति को दबाने का प्रयास किया जा रहा है विजय राज सिंह ने कहा कि बिहार में 100 से ज्यादा छोटे-बड़े क्षत्रिय संगठन है.उनकी मंशा है, कि सभी संगठनों को एकिकृत कर एक मजबूत संगठन बनाया जाए. जो बिहार प्रदेश में क्षत्रिय समाज की आर्थिक सामाजिक उत्थान की दिशा में कार्य करें .उन्होंने कहा कि बेरोजगारी नशाखोरी दहेज जैसे सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा बिहार पूरे प्रदेश में जन जागरण अभियान चला रहा है.छपरा सीवान गोपालगंज मुजफ्फरपुर मोतिहारी सीतामढ़ी रक्सौल मधुबनी दरभंगा औरंगाबाद सासाराम आरा बक्सर गया नवादा बिहार शरीफ मुंगेर बेगूसराय मधेपुरा जिलों में प्रखंड स्तर तक संगठन को मजबूत किया गया है, एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि देश के विभिन्न हिस्सों में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा क्षत्रिय बच्चों के लिए रोजी रोजगार की व्यवस्था में भी लगा हुआ है राष्ट्रीय स्तर पर क्षत्रिय समाज को सुदृढ़ करने की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है.राजनीतिक साजिश के तहत हमारे इतिहास से खिलवाड़ करने वाले लोगों को मुंहतोड़ जवाब दिया गया है .फिल्म निर्माण करने वाले लोगों का या इतिहास को परिभाषित करने की कोशिश करने वाले लोगों के दिलो दिमाग में बैठा दिया गया है कि समाज के खिलाफ कुछ भी अवांछित कार्य हुआ पूरे देश में इसका पुरजोर विरोध होगा।हाल ही में आई एक हिंदी फिल्म को लेकर क्षत्रिय समाज के सवाल पर उन्होंने कहा काल्पनिक कहानियों और वास्तविक कहानियों को एक नहीं किया जा सकता यह पूरी दुनिया जानती है दुनिया के इतिहास में लिखा हुआ है राजपूतों से ज्यादा लड़ाका वीर कोई नहीं होता.(रिपोर्ट-अनूप नारायण सिंह)
लेखक, कवि और समाज-सेवी डॉ. कुमार अरुणोदय
Rupesh Kumar 2020-02-05 12:08:45
पटना, 5 फरवरी 2020, (आरएनआई )। लेखक, कवि और समाज-सेवी डॉ. कुमार अरुणोदय ने अपने दृढ संकल्प और अथक प्रयास से राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं, समाज के पिछड़े वर्ग के बच्चों तथा वृद्धों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। बिहार प्रान्त के सीतामढ़ी जिले का यह लाल पूरे देश के नवोज्ज्वल भाल पर अपनी प्रतिभा की अरुणाई बिखेर रहा है। तरुणाई में ही वस्तु शिल्प के क्षेत्र में अपना लोहा मनवा लेने वाले डॉ. अरुणोदय सहृदय व्यक्ति और भावुक साहित्यकार होने के साथ ही अत्यंत लगनशील और समर्पित समाज-सेवी हैं। साहित्य-सृजन, वास्तुशिल्प, रंगमंच, क्रीड़ा, शिक्षा, संगीत और समाज-सेवा आदि में उनकी खास लगन है और ये ही उनके अध्ययन, मनन, अनुसंधान एवं सृजन के क्षेत्र हैं। इन विविध क्षेत्रों में उनकी इस क्रियाशीलता के केंद्र में उनकी वह सघन भावुकता है, जो एक ओर उन्हें अपनी परंपरा से जोड़े रखती है और दूसरी ओर स्वयं के उच्चादर्शों के अनुरूप सुनहरे समाज के निर्माण की ओर प्रेरित करती है।
गरीबी और अभाव भी नहीं रोक पाई जिन्हें मंजिल तक पहुंचने में
Rupesh Kumar 2020-02-05 12:05:40
पटना, 5 फरवरी 2020, (आरएनआई )। 1979 को गाजीपुर में जन्‍मे दिनेशलाल यादव निरहुआ आज अपनी जिंदगी की जिस ऊंचाईयों पर हैं, उसके लिए उनका मेहनत, दृढ़ संकल्‍प और ईमानदारी है। तभी आज वे अभिनेता के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेता भी हैं। मगर एक वक्त ऐसा भी था जब तंगी में निरहुआ और उनके परिवार को जिंदगी बसर करनी पड़ गई थी।(रिपोर्ट-अनूप नारायण सिंह)
बिहार पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह की कलम से पढ़िए जीवन का मर्म
Rupesh Kumar 2020-02-03 12:22:58
पटना, 3 फरवरी 2020, (आरएनआई )। मोह - भ्रम, ज्ञान के बाद यदि अज्ञान का जन्म होता है तो वह मोह - भ्रम, ज्ञान "जहर" है।किन्तु उससे ऊपर उठ कर ज्ञान के बाद यदि नम्रता का जन्म होता है।तो वही ज्ञान "अमृत" होता है।और वो अमृत देश - समाज के एकता - अखंडता को अमरत्व प्रदान करता है।रामचरितमानस के एक वाक़या उद्धृत करता हु ।राक्षसों के वध के लिए विष्णु जी राम अवतार में अयोध्या में जन्म लिए। विधि के विधान के तहत चौदह वर्ष का वनवास राम को होता है।सीता और लक्ष्मण भी वनवास में साथ होते है । उसी समय के कई ज्ञान - उपदेश - कल्याण आज उद्धरण बने हुवे है ।पंचवटी में लक्ष्मणजी प्रभु से पूछते हैं कि आप मुझे समझाकर यह बताएं कि ज्ञान, वैराग्य और माया का स्वरूप क्या है ? आपकी भक्ति क्या है ? तथा ईश्वर तथा जीव में क्या भेद है ? फिर वे अंत में इन प्रश्नों के पूछे जाने के पीछे अपना उद्देश्य बताते हुए कहते हैं कि प्रभु ! जिससे मेरे जीवन में जो शोक, मोह और भ्रम विद्यमान है वे दूर हों तथा आपके चरणों में अनुराग हो जाए । लक्ष्मणजी के द्वारा पूछे गए ये प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हैं । परमार्थ तत्व के लिए जिज्ञासापूर्वक किए गए इन प्रश्नों तथा भगवान राम के द्वारा दिए गए उनके उत्तर को 'मानस' में *रामगीता* के नाम से जाना जाता है । इसमें लक्ष्मणजी अपने प्रश्नों के माध्यम से मनुष्य के साथ जुड़ी भी शाश्वत समस्याओं का समाधान प्रभु से पाना चाहते हैं । भ्रम में अर्जुन भी कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में भगवान कृष्ण के माध्यम से इसी प्रकार की समस्याओं का समाधान प्राप्त करते हैं और वह उपदेश *भागवत गीता* के रूप में प्रसिद्ध है।पंचवटी में लक्ष्मणजी के प्रश्नों को सुनकर भगवान राम उनसे कहते हैं - लक्ष्मण ! तुमने प्रश्न तो बहुत से कर दिए पर मैं इनका उत्तर बहुत विस्तार से न देकर संक्षेप में ही सब समझाऊँगा । और साथ-साथ प्रभु ने यह भी कह दिया कि मैं जो कुछ कह रहा हूं, उसे तुम मन, बुद्धि और चित्त लगाकर सुनो । लक्ष्मणजी के द्वारा कहे गए तीन शब्द शोक, मोह और भ्रम तथा प्रभु के द्वारा भी प्रयुक्त तीन शब्द मन, बुद्धि और चित्त ये आपस में पूरी तरह एक दूसरे से जुड़े हुए हैं । अंतःकरण चतुष्टय में मन ही शोक का केंद्र है । किसी घटना को देख या सुनकर मन में ही पीड़ा की अनुभूति होती है । परिवार, समाज तथा देश में घटने वाली हजारों घटनाएं हैं जिनसे व्यक्ति के मन में शोक उत्पन्न होता है । और जिस प्रकार शोक की समस्या मन से जुड़ी हुई है, भ्रम की समस्या का संबंध बुद्धि से जुड़ा हुआ है । भ्रम, व्यक्ति की बुद्धि में उत्पन्न होता है । मानस में इसका संकेत देवर्षि नारद के प्रसंग में वर्णन आता है कि देवर्षि नारद के अंतःकरण में यह अभिमान उत्पन्न हो गया कि मैंने सब विकारों को जीत लिया है । उस समय भगवान उनके इस गर्व को नष्ट करने के लिए अपनी माया को आदेश देते हैं । देवर्षि अपनी विजय-गाथा सुनाकर जब क्षिरसागर से लौटते हैं तब मार्ग में उन्हें एक नए नगर का दर्शन होता है । उस नगर के स्वामी, राजा शीलनिधि हैं तथा उनकी कन्या है जिसका नाम विश्वमोहिनी है । वस्तुतः वह एक वास्तविक नगर नहीं था, अपितु भगवान के संकल्प से निर्मित एक माया-नगर था । वह नगर पहले भी नहीं था और बाद में भी नहीं था । नारद वहां चले गए फिर उनके भीतर एक तीव्रतम का आकांक्षा का उदय हो गया । वे उस कन्या से विवाह करने के लिए व्यग्र हो उठे । यद्यपि देवर्षि नारद के जीवन में धर्म, कर्म, पूजा-पाठ आदि सब सम्यक रूप से विद्यमान हैं, पर उस समय उनकी जो मनःस्थिति हो गई वह तो मानो 'कामगीता' का ही उदाहरण है । उस समय उन्हें जप-तप आदि का विस्मरण हो गया । वे केवल इसी सोच में निमग्न हो गए कि कैसे शीध्र ही इस कन्या की प्राप्ति मुझे हो जाए ! यह हमारे मन की वृत्ति का ही एक चित्रण है । जब हमारे मन में कोई प्रलोभन उत्पन्न होता है, कोई आकांक्षा उत्पन्न होती है, कोई वासना उत्पन्न होती है तो उसकी पूर्ति के लिए मन में जो व्यग्रता जागृत होती है, उसका संकेत ही इस प्रसंग के माध्यम से मिलता है।आज देश में कुछ लोगों के मन में भ्रम उत्पन्न हो गया है।बुद्धि होते हुवे भी भ्रम में है।देश - समाज आशांत हो रहा है। ज्ञान होते हुवे भी धरना - प्रदर्शन हो रहा है । प्रेम भाईचारा कमज़ोर हो रहा है । देश की एकता - अखंडता पर प्रहार हो रहा है।आज देश - समाज में लोगों को भ्रम क्यों होते हैं ? तथा इनसे मुक्त होने की पद्धति क्या है ? इसके उत्तर में हम ऐसा मानते हैं कि ये तो रहेंगे ही और व्यक्ति को इस शब्दों से ऊपर उठ कर सबके साथ प्रेम - भाईचारे में रहना पड़ेगा, जीना पड़ेगा।सभी भारतीए माँ भारती के संतान है । माँ भारती सभी के लिए महत्वपूर्ण है ।आधुनिक चिकित्सा-पद्धति में डॉक्टर जिस प्रकार कई रोगों के विषय में यही धारणा रखते हैं कि वे ठीक नहीं हो सकते और व्यक्ति को उनके साथ ही रहना होगा , जीना होगा , ठीक उसी प्रकार इन समस्याओं को भी असाध्य और अपरिहार्य माना जाता है । पर अध्यात्म तत्व एवं मैं इसे स्वीकार नहीं करता । वस्तुतः मानव जीवन में ये जो समस्याएं दिखाई देती हैं उनका कारण स्वयं के भीतर है । और यदि हम उसे समझ लें तो बाहर दिखने वाली समस्याओं का समाधान अपने आप हो जाएगा।जिन्हें भ्रम में फ़िक़र है कल की वे जग रहे रात भर , जिन्हें यकीन है ईश्वर पर वे सोए रहे रात भर।एक अंत में संदेश :-(रिपोर्ट-अनूप नारायण सिंह)
भोजपुरी लोकगीतों की मधुर स्वर डॉक्टर नीतू नवगीत
Rupesh Kumar 2020-02-01 21:53:26
पटना, 1 फरवरी 2020, (आरएनआई )। फूहड़पन और अश्लीलता के कारण लोकगीतों की काफी बदनामी हुई है । अनेक गायक इसी कारण लोकगीतों से मुंह मोड़ रहे हैं। लेकिन सच यह भी है कि लोकगीत हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा है और इसकी मिठास हमारे जीवन को रसमय बनाए रखती है । लोकगीत मां की लोरी जैसे होते हैं । यह कहना है बिहार के प्रसिद्ध लोक गायिका डॉ नीतू कुमारी नवगीत का जो कि मुंगेर महोत्सव में भाग लेने के लिए आई हुई हैं । हिंदी साहित्य से डॉक्टरेट करने वाली नीतू कुमारी नवगीत ने लोक गायकी के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है । दूरदर्शन और आकाशवाणी के कई कार्यक्रमों में शिरकत कर चुकी डॉ नीतू कुमारी नवगीत का जन्म वैसे तो रांची में हुआ है लेकिन वह पूरी तरह से बिहार के लोकगीतों के प्रति समर्पित हैं । लोकगीतों के कई एल्बम में उनकी भागीदारी रही है जिनमें बिटिया है अनमोल रतन, गांधी गान, स्वच्छता संदेश, पावन लागे लाली चुनरिया और मोरी बाली उमरिया शामिल हैं । लोकगीतों की पारंपरिक मिठास को बनाए रखने के लिए सदैव प्रयत्नरत डॉ नीतू कुमारी नवगीत ने इस संबंध में विस्तार से बताया कि एक लोक गायिका की क्या इच्छा होती है ? अपने देश की माटी की सोंधी महक से वातावरण सुवासित रहे, अपनी संस्कृति का परचम लहराता रहे और देसज धुनों और देसी गानों की गूंज से हमारा जीवन गुंजित होता रहे । जिन गीतों को हमारी दादी- नानी और उनकी दादी-नानी ने गाया, बड़े प्यार से सहेजा, उन गीतों की परंपरा जारी रहना चाहिए । हर पर्व, हर त्यौहार और जन्म, छठी, सतईसा, मुंडन,उपनयन, शादी-विवाह सहित जीवन के हर अवसर के लिए गीत हमारे गांव में मौजूद हैं, हमारी जड़ों में हैं । कोई लाख कोशिश कर ले, आधुनिकता की चाहे कितनी भी लंबी चादर ओढ़ ले; अपनी जड़ों से कटकर ज्यादा दिन तक जी नहीं सकता । दुनिया का कोई भी बिस्तर मां की गोद की जगह नहीं ले सकता । बड़े-बड़े साहित्यकारों की रचनाएं भी दादी नानी की कहानियों से बड़ी नहीं हो सकती । उसी तरह से लोक संगीत है । पश्चिमी संगीत और फिल्मी संगीत का अपना महत्व है लेकिन लोक संगीत का जीवन में वही स्थान है जो दादी-नानी की कहानियों का है । जीवन के सबसे महत्वपूर्ण अवसरों पर और जीवन के सबसे चुनौतीपूर्ण मौकों पर हमारा अपना लोक संगीत हमारे साथ खड़ा होता है । हमारे मानस को बनाता हुआ, हमारे विश्वास को बढ़ाता हुआ । भिखारी ठाकुर और महेंदर मिसिर से लेकर विंध्यवासिनी देवी और शारदा सिन्हा तक ने बिहार के लोकगीतों पर काफी काम किया है और इसे विश्वस्तरीय पहचान दी है । एक युवा कलाकार के तौर पर मेरी कोशिश होती है कि लोक गायकी के इन महान कलाकारों ने जो समृद्ध विरासत तैयार की है, उसी को थोड़ा आगे मैं भी बढ़ाऊं । हमेशा कोशिश करती हूं कि लोकगीतों के गायन के समय इसकी आत्मा अक्षुण बनी रहे । इसकी पारंपरिक मिठास और कर्ण प्रियता पर कोई असर ना पड़े । भोजपुरी में हजारों लोकगीत है । अनेक लोकगीतों पर काम हुआ है, लेकिन अभी बहुत काम होना बाकी है । सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में बहुत कुछ गलत भी हुआ है । द्विअर्थी बोल वाले गानों के प्रचलन के कारण भोजपुरी लोक संगीत को बदनामी भी काफी मिली है और स्वनामधन्य सुसंस्कृत लोग इसी आधार पर भोजपुरी गीतों से परहेज भी करने लगे हैं । लेकिन हकीकत तो यही है कि हर क्षेत्र में कुछ अच्छे लोग होते हैं और कुछ खराब लोग । भोजपुरी संगीत के मामले में भी ऐसा है । कुछ कलाकार भोजपुरी गीतों को सड़कछाप संगीत में बदलकर अपना हित साधने में लगे हैं । एक बड़ा श्रोता वर्ग भी ऐसे गीतों को पसंद करता है । लेकिन ऐसा साहित्य के मामले में भी होता है जब हम देखते हैं कि अश्लीलता से परिपूर्ण साहित्य नुक्कड़ की दुकानों पर ज्यादा बिकता है । लेकिन उस आधार पर पूरे साहित्य को गंदा तो नहीं कहा जा सकता है । वस्तुतः नुक्कड़ पर बिकने वाली अश्लील किताबें साहित्य की श्रेणी में रखी ही नहीं जाती है तो फिर लोक संगीत के मामले में भी ऐसा ही होना चाहिए । सड़क छाप एल्बमों के आधार पर भोजपुरी लोक गायन के संसार को खराब कह देना गलत है । (रिपोर्ट-अनूप नारायण सिंह)

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